July 10, 2026

आर्य समाज छिन्दवाड़ा : परिचय एवं गतिविधियाँ

आर्य समाज छिन्दवाड़ा : परिचय एवं गतिविधियाँ प्राचीनतम वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार एवं महर्षि दयानन्द सरस्वती के सन्देश को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से सन् 1904 में नई आबादी क्षेत्र में आर्य समाज की स्थापना की गई। स्थापना वर्ष से लेकर वर्तमान तक आर्यजनों की एक लम्बी श्रृंखला रही है जिन्होंने संस्कृति के

प्रचार-प्रसार में अपना अमूल्य योगदान दिया। स्थापना के लगभग 75 वर्ष बाद सन् 1978 में प्राथमिक विद्यालय की शुरुआत की गई जिसमें शिक्षा के साथ-साथ विद्यार्थियों को वैदिक विचारधारा से परिचित कराने का उद्देश्य रखा गया । वर्तमान में वही विद्यालय उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं (बारहवीं) तक संचालित हो रहा है।

महर्षि दयानन्द द्वारा स्थापित गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति के विस्तार हेतु आर्य समाज के संरक्षक महोदय श्री बीरबल जी आर्य द्वारा समीपस्थ स्थित

ग्राम सोनाखार में चार एकड़ भूमि दान दी गई जिस पर सन् 2008 में महर्षि दयानन्द सरस्वती आर्ष गुरुकुल की स्थापना की गई जिसमें विभिन्न प्रदेशों से आए ब्रह्मचारियों को पूर्णतः निःशुल्क आवासीय व्यवस्था एवं वैदिक संस्कृति से ओत-प्रोत गुरुकुलीय शिक्षा आचार्य ओमदेव जी के सान्निध्य में प्रदान की जा रही है। गुरुकुलीय शिक्षा के साथ ही गौशाला का भी संचालन किया जा रहा है जिसमें लगभग 30 गायों की व्यवस्था की गई है।

आर्य समाज की गतिविधियों एवं वैदिक विचारधारा के प्रचार-प्रसार को और अधिक विस्तारित करने के उद्देश्य से अपना सम्पूर्ण जीवन लगाने वाले संरक्षक श्री भुवन जी आर्य द्वारा बालक गुरुकुल की स्थापना हेतु समीपस्थ ग्राम मेघासिवनी में 5 एकड़ जमीन दान दी गई जिस पर निकट भविष्य में लगभग 100ब्रह्मचारियों की आवासीय एवं शिक्षण की व्यवस्था होगी।